कलबी (आजणा) समाज और भाजपा का सफर — एक संघर्ष और विश्वास की कहानी

कलबी (आजणा) समाज और भाजपा का सफर — एक संघर्ष और विश्वास की कहानी
आज हमारा आजणा (कलबी) समाज जिस मजबूती और सक्रियता के साथ भारतीय जनता पार्टी के साथ खड़ा है, उसकी शुरुआत 1990 के दौर से मानी जाती है।
साल 1990 में राजस्थान में जनता दल और भाजपा की गठबंधन सरकार बनी, जिसमें भैरों सिंह शेखावत मुख्यमंत्री बने। उस समय पूरे देश में भाजपा की केवल कुछ ही राज्य सरकारें थीं, और इसी दौरान राम मंदिर आंदोलन ने जोर पकड़ा।
1992 में विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद, तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव की सरकार ने कई राज्यों की सरकारें बर्खास्त कर दीं, जिनमें राजस्थान भी शामिल था।
उस समय राजस्थान का कलबी समाज मुख्य रूप से कांग्रेस का समर्थक था और नाथूराम मिर्धा जैसे बड़े किसान नेता का प्रभाव था। हमारे बाप-दादा भी कांग्रेस के ही वोटर रहे।
इसी बीच एक ऐतिहासिक मोड़ आया, जब मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत जी शिकारपुरा धाम पहुंचे और वहां के गादीपति पूजनीय किसनाराम जी महाराज से मुलाकात हुई। चर्चा के दौरान समाज की वर्षों पुरानी मांग—कलबी समाज को OBC में शामिल करने की—का मुद्दा सामने आया।
शेखावत जी ने समाज से भाजपा पर विश्वास जताने की बात कही, और यहीं से बदलाव की शुरुआत हुई।
1993 के चुनाव में भाजपा ने पहली बार कलबी समाज को प्रतिनिधित्व देते हुए भीनमाल से पुराराम चौधरी जी और सांचौर से मोतीराम जी को टिकट दिया। उस समय कई चुनौतियाँ थीं, लेकिन समाज ने धीरे-धीरे भाजपा की ओर रुख किया।
सरकार बनने के बाद, समाज की OBC में शामिल करने की मांग फिर उठाई गई। कई राजनीतिक अड़चनों के बावजूद, अंततः भैरों सिंह शेखावत जी ने अपना वादा निभाते हुए कलबी समाज को OBC वर्ग में शामिल करवाया। इसमें संगठन के नेताओं जैसे ओम माथुर का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा।
निष्कर्ष:
नेता वही होता है जो अपने समाज के लिए खड़ा रहे, संघर्ष करे और वादे निभाए।
हमारा कलबी समाज आज जिस मुकाम पर है, वह ऐसे ही मजबूत नेतृत्व और सामूहिक विश्वास का परिणाम है।
ऐसे ही हमारे समाज के कोहिनूर, बब्बर शेर — आदरणीय पुराराम जी चौधरी। 🐅

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